दिखावे की चिंता छोड़िए यह सोचकर कि 'लोग क्या कहेंगे' किसी काम को करने से पहले मन दुविधा में पड़ जाता है। एक अज्ञात चिंता हमें सत…
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It is to this that Indian civilization is now rising again, as it has always done in the unbroken power of its spirit.
Even the most dispassionate to
अतीतजीवी होना अच्छा नहीं असफलता में भी सफलता की तैयारी होती है;
हमारी रातें अपने में एक महानतर अरुणोदय का रहस्य लिए रहती
हैं। मगर यदि कोई जाति अथवा सभ्यता शक्तिशाली होते हुए भी अंधी होकर उन प्रवृत्तियों पर जोर देती है,जो विनाश की ओर ले जाती हैं या यदि वह केवल मृत-काल की शक्तियों को ही पोषित करती है और भविष्य की शक्तियों को अपने से अलग रखती है; यदि वह जो जीवन था,उसे,जो जीवन होगा,उससे अधिक पसंद करती है,तो प्रचुर शक्ति,साधन और अवसर भी उसे अपरिहार्य विघटन से नहीं बचा सकेंगे।
किंतु यदि उसमें अपने में एक सशक्त विश्वास और जीवित रहने का पुष्ट संकल्प आ जाता है,तो वह प्रतिकूलता और पराजय से भी अजेय विजय का बल निकाल सकती है और असहायता व अवनति से पुनरुद्धार की महान ज्योति के रूप में ऊपर उठकर अधिक भव्य जीवन के प्रकाश की ओर जा सकती है।
यही करने के लिए अब भारतीय सभ्यता फिर से उठ खड़ी हो रही है,जैसी वह अपनी आत्मा की अखंड शक्ति में सदैव करती आई है।
भारतीय मानस के सबसे अधिक विरागी स्वरों में भी ऐसा कुछ नहीं है,जैसा यूरोपीय निराशावाद का काला अवसाद है।
यहां मृत्यु से पहले की दुखी और सिकुड़ती जैसी प्रवृत्ति भी नहीं है,जो पाश्चात्य साहित्य में है। विरागी निराशावाद का स्वर,जो प्रायः 'क्रिश्चियनिटी' में पाया जाता है,पाश्चात्य स्वर है,क्योंकि वह ईसा
मसीह के उपदेशों में विद्यमान नहीं है।
अपने सलीब के साथ कष्ट द्वारा मुक्ति तथा कब्र के उस पार मनुष्य के लिए इंतजार करती हुई अनंत नरक की लपटें,इस सबमें जो आतंक की छाप है,वह भारतीय मानस के लिए विदेशी है,उसमें वस्तुतः धार्मिक आतंक अज्ञात है।...
भारतीय वैराग्य दुख का एक शोकप्रद धर्मोपदेश अथवा विकृत तपस्या में शरीर का कष्टदायक दमन नहीं है,बल्कि एक उच्चतर आनंद और आत्मा के संपूर्ण आधिपत्य की ओरकिया गया उत्कृष्टप्रयास है। ..
उसके लिए वैराग्य चुने गए अपेक्षाकृत कुछ लोगों द्वारा ही
व्यवहृत नहीं है,किंतु अपने वृहद् रूप में सभी के लिए उपदिष्ट होने और हजारों अनुपयुक्त लोगों द्वारा अंगीकार यदि किसी सभ्यता में एक सशक्त विश्वास और जीवित रहने का पुष्ट संकल्प आ जाता है,तो वह प्रतिकूलता और पराजय से भी अजेय विजय का बल निकाल सकती है। किए जाने से,उसके मूल्यों में गिरावट आ सकती है,नकलों की बहुतायत हो सकती है और समुदाय की जीवन-शक्ति अपना लचीलापन तथा अपनी अग्रगामी गति खो सकती है। यह दावा करना व्यर्थ होगा कि ऐसे दोष और भद्दे परिणाम भारत में मौजूद नहीं रहे हैं।
मानव अस्तित्व की समस्या के अंतिम हल के रूप में मैं वैराग्य के आदर्श को स्वीकार भी नहीं करता; किंतु उसकी अतिशयोक्तियों के पीछे भी एक महान भावना है,बनिस्बत जैव-शक्तिवादी अतिशयोक्तियों के,जो कि पश्चिमी संस्कृति के विपरीत दोष हैं।
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